❖हिन्दवी स्वराज्य के प्रणेता
छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान योद्धा और राजा थे, और 17वीं सदी में पश्चिमी भारत में मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे। उनका जन्म 1630 में शिवनेरी के किले में हुआ, जो वर्तमान महाराष्ट्र में है। उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले और माता का नाम जीजाबाई था।
मान्यता है कि जीजाबाई ने भगवान शिव से प्रार्थना कर उनके जैसा पुत्र मांगा था, जिस कारण उनका नाम भगवान शिव के नाम पर शिवाजी रखा गया। बालपन में माता जीजाबाई उन्हें महाभारत, रामायण और गौरवशाली गाथाएं सुनाया करती थीं — और उन्होंने इन महाकाव्यों की आदर्श शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात किया।
❖"जाणता राजा" — प्रजा का शासक
अपनी माँ जीजाबाई, समर्थ गुरु रामदास और भारत के अन्य संतों एवं समाज के उत्थान के आदर्शों से प्रेरित होकर शिवाजी महाराज ने न केवल हिंदुओं की सुप्त चेतना को जागृत किया, बल्कि उन्हें संगठित करते हुए मुगल शक्ति को खुली चुनौती दी। उन्होंने बचपन से यही सीखा कि जाति या धर्म से ऊपर सभी मनुष्यों को भगवान ने एक समान बनाया है और उनके बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने हिंदुओं की एकता को प्रोत्साहन देकर "सनातन धर्म" का प्रचार किया — एक ऐसा धर्म जो जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर महिलाओं की प्रतिष्ठा व अधिकार, तथा कर्मकांडों पर भक्तिभाव को प्राथमिकता देता है।
सामाजिक न्याय और समानता उनके प्रशासन की आधारशिला थी। एक महान "हिंदवी साम्राज्य" की स्थापना करते हुए, विभाजनकारी और दमनकारी इस्लामी शासन का प्रतिरोध कर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू धर्म का पुनरुत्थान और प्रसार सुनिश्चित किया। विद्वानों, कलाकारों और कवियों को संरक्षण प्रदान किया गया। यही कारण था कि उन्हें "जाणता राजा" कहा जाने लगा — जिसका अर्थ है "प्रजा का शासक"।
शिवाजी ने एक ऐसे हिंदवी साम्राज्य की स्थापना की जिसमें प्रजाजनों का हित-संरक्षण सर्वोपरि था। उन्होंने औरंगज़ेब के जबरन धर्मांतरण और इस्लामीकरण का सबल विरोध करते हुए गैर-मुस्लिमों के धर्म और संस्कृति का संरक्षण किया। हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक और हिंदू हितों के संरक्षक के रूप में उन्होंने हिंदू अस्मिता की प्रतिस्थापना, सनातन संस्कृति के पुनरुद्धार, तथा मंदिरों के संरक्षण व निर्माण पर सर्वाधिक बल दिया। इसीलिए वे हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलनों, विचारधाराओं और व्यक्तियों के प्रेरणा-स्रोत हैं।
❖सैन्य एवं रणनीतिक उपलब्धियाँ
शिवाजी की सैन्य सफलताएँ समकालीन सेनानायकों के लिए भी विस्मयकारी थीं। उन्होंने 1646 में आदिल शाही को चुनौती देते हुए तोरण किले पर अधिकार कर लिया — इस साहसिक विजय ने मुगल साम्राज्य और आदिल शाही जैसी दुर्जेय शक्तियों को स्तब्ध कर दिया। आगे चलकर उन्होंने रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया, और पुरंदर के युद्ध में फतेहख़ान के नेतृत्व वाली विशाल सेना को बुरी तरह पराजित किया।
महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों और समुद्र-तट पर उन्होंने अनेक किलों का निर्माण कराया, जिन्होंने हिन्दवी साम्राज्य की रक्षा-पंक्ति को सुदृढ़ किया। समुद्री शक्ति के महत्व को समझते हुए उन्होंने एक सशक्त नौसेना और सिंधुदुर्ग जैसे जलदुर्ग खड़े किए, और हिंद महासागर के व्यापार मार्गों में यूरोपीय शक्तियों के प्रभुत्व को चुनौती दी। गुरिल्ला युद्ध के वे माहिर थे — तीव्र और अचानक आक्रमण उनकी रणनीति की पहचान थे।
❖अष्टप्रधान मंडल
शिवाजी की विशेषता एक सुपरिभाषित प्रशासनिक संरचना थी, जो प्रभावी शासन सुनिश्चित करती थी। उनकी मंत्रिपरिषद् "अष्टप्रधान मंडल" कहलाती थी — आठ मंत्रियों की एक परिषद् जो राजा को राज्य के प्रशासन हेतु सही परामर्श देती और अपने-अपने विभाग के कार्यों का निष्पादन करती थी।
❖सुधार, जनकल्याण एवं संस्कृति
शिवाजी ने विकेन्द्रित शासन और स्थानीय सशक्तिकरण पर केंद्रित अनेक प्रशासनिक सुधार किए। उन्होंने बाज़ार स्थापित कर व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा दिया, सड़कों, पुलों और जल-प्रबंधन प्रणालियों का निर्माण कराया, और सिंचाई व जल-संरक्षण के नवीन उपाय अपनाए जिनसे कृषि को बल मिला और सूखे के समय सहायता हुई।
उन्होंने मातृभाषा, संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति के विकास को प्रोत्साहित किया तथा विद्वानों और कवियों का संरक्षण किया। शिवाजी ने महिला सशक्तिकरण पर भी बल दिया और उच्च शिक्षा एवं कौशल के अवसर प्रदान कर महिलाओं को प्रशासनिक तथा सामाजिक भूमिकाओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।
❖माँ जीजाबाई का योगदान
शिवाजी महाराज के जीवन-मूल्यों और मौलिक सिद्धांतों में उनकी माँ जीजाबाई का बहुत बड़ा योगदान था। उन्होंने शिवाजी को एक विद्वान, साहसी और दानशील नेता बनाया, जिनका योगदान आज भी भारतीय इतिहास में स्मरण किया जाता है। उनका युद्ध-कौशल और नीति-निपुणता उन्हें एक अद्वितीय और सशक्त योद्धा बनाती है।